शुक्रवार, 27 मई 2016

कविता "चक्र है आवागमन का" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
था कभी ये 'रूप' ऐसा।
हो गया है आज कैसा??
 
बालपन में खेल खेले।
दूर रहते थे झमेले।।

छा गई थी जब जवानी।
शक्ल लगती थी सुहानी।।
 
तब मिला इक मीत प्यारा।
दे रहा था जो सहारा।।

खुशनुमा उपवन हुआ था।
धन्य तब जीवन हुआ था।।
 
बढ़ी गई जब मोह-माया।
तब बुढ़ापे ने सताया।

जब हुई कमजोर काया।
मौत का आया बुलावा।।

जगत है जीवन-मरण का।
चक्र है आवागमन का।।

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