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सोमवार, 11 जून 2018

दोहे "बदल गये हैं अर्थ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आजादी के आज तो, बदल गये हैं अर्थ। 
उनकी है स्वाधीनता, जो सम्पन्न-समर्थ।।

सबको ही अच्छा लगे, भारत का संगीत। 
गाते फिर हम किसलिए, अंग्रेजी के गीत।।

पुरवइया के साथ में, पड़ने लगी फुहार। 
सूखे बाग-तड़ाग में, फिर आ गया निखार।।

बैरी से करना नहीं, प्यारभरी मनुहार। 
जीवन के संग्राम में, नहीं मानना हार।।

नैसर्गिक अनुभाव का, होने लगा अभाव। 
दुनियाभर में हो रहा, मौसम में बदलाव।।

पेड़ कट गये धरा के, बंजर हुई जमीन। 
प्राणवायु घटने लगी, छाया हुई विलीन।।

महक लुटाते जा रहे, एला और लवंग। 
लेकिन अब कश्मीर में, केशर है बदरंग।।

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