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शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

दोहे "जिजीविषा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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रहती है आकांक्षा, जब तक घट में प्राण।
जिजीविषा के मर्म को, कहते वेद-पुराण।।
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जीने की इच्छा सदा, रखता मन में जीव।
करता है जो कर्म को, वो होता सुग्रीव।।
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आशायें जीवित रहे, जब तक रहे शरीर।
जिजीविषा के साथ में, सब करते तदवीर।।
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धन-दौलत की चाह में, पागल हैं सब लोग।
जीवन के हर मोड़ पर, जिजीविषा का योग।।
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जिजीविषा का है नहीं, जग में आदि न अन्त।
जोत जगा कर ज्ञान की, बन जाओ श्रीमन्त।।
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मानस में खिलते रहें, जिजिविषा के फूल।
लेकर प्रीत कुदाल को, मिटा दीजिए शूल।।
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बड़ा अनोखा है यहाँ, जिजीविषा का मन्त्र।
तन्त्र चलाने के लिए, जिजीविषा है यन्त्र।।
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8 टिप्‍पणियां:

  1. अति सुन्दर 👌 दोहे आपकी लेखनी को नमन

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (११ -०१ -२०२०) को "शब्द-सृजन"- ३ (चर्चा अंक - ३५७७) पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    -अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  3. रहती है आकांक्षा, जब तक घट में प्राण
    जिजीविषा के मर्म को, कहते वेद-पुराण



    बहुत खूब.... लाज़बाब सृजन सर ,सादर नमस्कार

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर दोहे आदरणीय 👌

    जवाब देंहटाएं
  5. मुझे यह आर्टिकल पड कर बहुत अच्छा लगा कि हमारे देश भी technlogy के मामले आगे बड रहा है। मैंने भी अपना ब्लॉग बनाया है चाहे तो आप एक बार अवश्य visit करें ।
    Mahakal Status

    जवाब देंहटाएं

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