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शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

दोहागीत "मन्द-सुगन्ध बयार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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मौसम लेकर आ गया, वासन्ती उपहार।
जीवन में बहने लगी, मन्द-सुगन्ध बयार।।
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सरदी अब कम हो गयी, बढ़ा धरा का ताप।
उपवन में करने लगे, प्रेमी मेल-मिलाप।।
खुश हो करके खिल रहे, सेमल और कपास।
लोगों को होने लगा, वासन्ती आभास।।
सरसो फूली खेत में, गया कुहासा हार।
जीवन में बहने लगी, मन्द-सुगन्ध बयार।।
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बया बनाने लग गया, फिर से भव्य कुटीर।
नदियों में बहने लगा, पावन निर्मल नीर।।
पीपल गदराया हुआ, बौराया है आम।
कुदरत के बदले हुए, लगते अब आयाम।।
कोयल और कबूतरी, तन को रहे सँवार।
जीवन में बहने लगी, मन्द-सुगन्ध बयार।।
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खग-मृग नर-वानर सभी, मना रहे सुख-चैन।
अपने-अपने मीत से, लड़ा रहे हैं नैन।।
धरती पर पसरी हुई, निखरी-निखरी धूप।
जन-जीवन का आज तो, बदल रहा है रूप।।
भोजन करके पेटभर, लेते लोग डकार।
जीवन में बहने लगी, मन्द-सुगन्ध बयार।।
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कुसुमों को निज अंक में, पाल रहे हैं शूल।
गुलशन में खिलने लगे, रंग-बिरंगे फूल।।
सरकंडे के नीड़ में, बंजारों का वास।
चारो और चहक रहा, वासन्ती मधुमास।।
सरकंडे के नीड़ में, बंजारों का वास।।
हरा-भरा फिर से हुआ, उजड़ा हुआ दयार।
जीवन में बहने लगी, मन्द-सुगन्ध बयार।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(०१-०२-२०२०) को "शब्द-सृजन"-६ (चर्चा अंक - ३५९८) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    -अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह!!बासंती छटा का मनोरम दृश्य खींच दिया आपने सर ।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर सर,प्रकृति की सुंदर झलक दिखा गई आपकी रचना ,सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
  4. बसंत के साथ प्रकृति के सभी परिवर्तनों को समेटता सरस सृजन।

    जवाब देंहटाएं

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