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बुधवार, 29 जनवरी 2020

वन्दना "मैं ज्ञान माँगता हूँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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मैं हूँ निपट भिखारी, कुछ दान माँगता हूँ।
झोली पसारकर माँ, मैं ज्ञान माँगता हूँ।।
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दुनिया की भीड़ से मैं,
बच करके चल रहा हूँ,
माँ तेरे रजकणों को,
माथे पे मल रहा हूँ,
निष्प्राण अक्षरों में, मैं प्राण माँगता हूँ।
झोली पसारकर माँ, मैं ज्ञान माँगता हूँ।।
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अज्ञान का अन्धेरा,
छँट जाये मन से मेरे,
विज्ञान का सवेरा,
हो जाये मन में मेरे,
मैं शीश को नवाकर, प्रज्ञान माँगता हूँ।
झोली पसारकर माँ, मैं ज्ञान माँगता हूँ।।
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तुलसी, कबीर जैसी,
मैं भक्ति माँगता हूँ,
मीरा व सूर सी माँ!
आसक्ति माँगता हूँ,
छन्दों का आपसे माँ, वरदान माँगता हूँ।
झोली पसारकर माँ, मैं ज्ञान माँगता हूँ।।
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3 टिप्‍पणियां:

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 30.1.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3596 में दिया जाएगा । आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी ।

    धन्यवाद

    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं

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