गुजर गया है अब तो यौवन। सुखद रहा वैवाहिक जीवन। सभी
उमंगें हुई पुरानी, ठहर
गये सागर रतनारे। आशाएँ
सरसाती सरगम, राग
सुनाते हैं जलधारे।। वृद्धावस्था में है बचपन। सुखद
रहा वैवाहिक जीवन।। अनुभव
के ही साथ सुमन में, समरसता
ठहराव आ गया। वेगवान
जीवन शैली में, थोड़ा
सा बदलाव आ गया। हँसता-खिलता
देख बगीचा, हुआ
प्रफुल्लित है घर-आँगन। सुखद
रहा वैवाहिक जीवन।। कहना-सुनना,
लिखना-पढ़ना, दिनचर्या
के साथी-संगी। फुलवारी
के सारे बिरुए, इन्द्रधनुष
जैसे बहुरंगी। देख-देख
अनमोल खजाना, पुलकित
हो जाता है तन-मन। सुखद
रहा वैवाहिक जीवन।। पूरी
हुईं कामनाएँ सब, आशा
के अनुरूप गगन है। वृद्धावस्था
के पड़ाव में, अच्छा
लगता भव्य-भवन है। ईश
यही अरदास आपसे, चलता
रहे सदा गठबन्धन। सुखद
रहा वैवाहिक जीवन।। स्वर्ण
जयन्ती को परिणय की, अगले
साल मनायेंगे हम। धूम-धाम
से फिर सजनी को, जयमाला
पहनायेंगे हम। आप
सभी को है आमन्त्रण, कुटिया
को कर देना पावन। सुखद
रहा वैवाहिक जीवन।। |
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आदरणीया अनीता सैनी "दीप्ति" जी, नमस्ते 🙏❗️
जवाब देंहटाएंआपने हमारे वरिष्ठ और मार्गदर्शक आ रूपचंद शस्त्री 'मयंक ' सर की. वैवाहिक सूत्रबंधन की पूर्व स्वर्ण जयंती पर अपने उदगार बहुत अच्छी तरह व्यक्त किए हैं. आपने ब्लॉग पर चर्चा अंक आयोजित कर ब्लॉग की उपयोगिता को जीवंत रखा है...आपका हार्दिक साधुवाद!
कृपया मेरे ब्लॉग पर मेरी रचना "मैं. ययावारी गीत लिखूँ और बंध - मुक्त हो जाऊं " पढ़ें, वहीँ पर यूट्यूब के दिए गए लिंक पर दृश्यों के संयोजन के साथ देखें और कविता मेरी आवाज़ में सुनें... सादर आभार!--ब्रजेन्द्र नाथ
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जवाब देंहटाएंआदरणीय अपको एंव आपकी गृहस्वामिणी जी को इस विशिष्ट दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई ।
जवाब देंहटाएंबहुत ही प्यारी रचना का सृजन किया है आपने इस विशेष मौके पर।
हृदय से शुभकामनाएं 🌹🌹
इस शुभ अवसर के लिए अति उपयुक्त रचना
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