-- कभी न देखा पीछे मुड़कर, कभी न देखा लेखा-जोखा। कॉपी-कलम छोड़ कर खुद को, मैंने ब्लॉगिंग में है झोखा।। -- इस आभासी जग में मुझको, सबने हाथों-हाथ लिया है। मेरे मामूली शब्दों को, सबने अपना प्यार दिया है। जाने कैसे रचनाओं पर, अब तक रंग चढ़ा है चोखा। कॉपी-कलम छोड़ कर खुद को, मैंने ब्लॉगिंग में है झोखा।। -- आयी कहाँ से किरण सुनहरी, किसने दीपक को दमकाया? कलियाँ सुमन बन गयी कैसे, किसने उपवन को महकाया? मेरी छोटी सी कुटिया में, ना खिड़की ना कोई झरोखा। कॉपी-कलम छोड़ कर खुद को, मैंने ब्लॉगिंग में है झोखा।। -- शब्दों की पहचान नहीं है, गीत-गज़ल का ज्ञान नहीं है। मातु शारदे रचना रचतीं, मुझमें छन्द विधान नहीं है। कैसे “रूप” निखारूँ अपना, मैं दुनिया का जन्तु अनोखा। कॉपी-कलम छोड़ कर खुद को, मैंने ब्लॉगिंग में है झोखा।। -- |
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