देखिए मेरी भी एक गीतनुमा बन्दिश- "कुहरा पसरा आज चमन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') -- सुख का सूरज नहीं गगन में। कुहरा पसरा आज चमन में।। -- पाला पड़ता, शीत बरसता, सर्दी में है बदन ठिठुरता, तन ढकने को वस्त्र न पूरे, निर्धनता में जीवन मरता, पर्वत पर हिमपात हो रहा, पौधे मुरझाये कानन में। कुहरा पसरा आज चमन में।। -- आपाधापी और वितण्डा, बिना गैस के चूल्हा ठण्डा, गइया-जंगल नजर न आते, पायें कहाँ से लकड़ी कण्डा, लोकतन्त्र की आजादी तो, कब से बन्धक राजभवन में। कुहरा पसरा आज चमन में।। -- जोड़-तोड़ षडयन्त्र यहाँ है? गांधीजी का मन्त्र कहाँ है? जिसके लिए शहादत दी थी. वो जनता का तन्त्र कहाँ है? कब्ज़ा है अब दानवता का, मानवता के इस आँगन में। कुहरा पसरा आज चमन में।। -- विदुरनीति का हुआ सफाया, दुरानीति ने पाँव जमाया, आदर्शों को धता बताकर, देश लूटकर सबने खाया, बरगद-पीपल सूख गये हैं, खर-पतवार उगी उपवन में। कुहरा पसरा आज चमन में।। -- |
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सोमवार, 14 दिसंबर 2020
गीत "कुहरा पसरा आज चमन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
रविवार, 13 दिसंबर 2020
गीत-गंगा मइया "जल का स्रोत अपार कहाँ है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
शनिवार, 12 दिसंबर 2020
गीत "काँटों ने उलझाया मुझको" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- जीवन के इस दाँव-पेंच में, मैंने सब कुछ हार दिया है। छला प्यार में जिसने मुझको, उससे मैंने प्यार किया है।। -- जब राहों पर कदम बढ़ाया, काँटों ने उलझाया मुझको। गुलशन के जब पास गया तो, फूलों ने ठुकराया मुझको। जिसको दिल की दौलत सौंपी, उसने ही प्रतिकार लिया है। छला प्यार में जिसने मुझको, उससे मैंने प्यार किया है।। -- संघर्षों के आँधी ने जब, नदिया में नौका भटकाई। तब-तब बहुत सावधानी से, मैंने थी पतवार चलाई। डूब गया मैं तट पर आकर, गहरा सागर पार किया है। छला प्यार में जिसने मुझको, उससे मैंने प्यार किया है।। -- बनकर कृष्ण-कन्हैया कब से, खोज रहा हूँ मैं राधा को। पगडण्डी से रोज-रोज ही, हटा रहा हूँ मैं बाधा को। ठगा मोहनी मुस्कानों ने, मैंने जब मनुहार किया है। छला प्यार में जिसने मुझको, उससे मैंने प्यार किया है।। -- |
शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020
बालकविता "श्रम के लिए बना है जीवन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
चिड़िया रानी फुदक-फुदक कर, मीठा राग सुनाती हो। आनन-फानन में उड़ करके, आसमान तक जाती हो।। --मेरे अगर पंख होते तो, मैं भी नभ तक हो आता। पेड़ो के ऊपर जा करके, ताजे-मीठे फल खाता।। -- जब मन करता मैं उड़ कर के, नानी जी के घर जाता। आसमान में कलाबाजियाँ कर के, सबको दिखलाता।। --सूरज उगने से पहले तुम, नित्य-प्रति उठ जाती हो। चीं-चीं, चूँ-चूँ वाले स्वर से , मुझको रोज जगाती हो।। --तुम मुझको सन्देशा देती, रोज सवेरे उठा करो। अपनी पुस्तक को ले करके, पढ़ने में नित जुटा करो।। -- चिड़िया रानी बड़ी सयानी, कितनी मेहनत करती हो। एक-एक दाना बीन-बीन कर, पेट हमेशा भरती हो।। -- अपने कामों से मेहनत का, पथ हमको दिखलाती हो।। श्रम के लिए बना है जीवन, सीख यही सिखलाती हो। -- |
गुरुवार, 10 दिसंबर 2020
बालकविता "गैस सिलेण्डर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गैस सिलेण्डर कितना प्यारा। मम्मी की आँखों का तारा।। -- रेगूलेटर अच्छा लाना। सही ढंग से इसे लगाना।। -- गैस सिलेण्डर है वरदान। यह रसोई-घर की है शान।। -- दूघ पकाओ, चाय बनाओ। मनचाहे पकवान बनाओ।। -- बिजली अगर नही है घर में। यह प्रकाश देता पल भर में।। -- बाथरूम में इसे लगाओ। गर्म-गर्म पानी से न्हाओ।। -- बीत गया है वक्त पुराना। अब आया है नया जमाना।। -- जंगल से लकड़ी मत लाना। बड़ा सहज है गैस जलाना।। -- किन्तु सुरक्षा को अपनाना। इसे कार में नही लगाना। -- |
बुधवार, 9 दिसंबर 2020
बालकविता "मेरी प्यारी पोती" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मम्मी-पापा तुम्हें देख कर, |
मंगलवार, 8 दिसंबर 2020
ग़ज़ल "हलाहल पिला दिया तुमने" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- दर्द का सिलसिला दिया तुमने आज रब को भुला दिया तुमने -- हमने करना वफा नहीं छोड़ा नफरतों का सिला दिया तुमने -- खिलती चम्पा को नोंचकर फेंका फिर नया गुल खिला दिया तुमने -- हमको आब-ए-हयात के बदले फिर हलाहल पिला दिया तुमने -- मौत माँगी थी हमने मौला से फिर से मुर्दा जिला दिया तुमने -- छाँव कैसे मिलेगी बरगद की पेड़ जड़ से हिला दिया तुमने -- 'रूप' की इस हसीन वादी में इश्क में विष मिला दिया तुमने -- |
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