"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

फ़ॉलोअर

रविवार, 13 दिसंबर 2020

गीत-गंगा मइया "जल का स्रोत अपार कहाँ है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

--
कलकल-छलछल, बहती अविरल,
हिमगिरि के शिखरों से चलकर,
आनेवाली धार कहाँ है।
गंगा की वो धार कहाँ है।।
--
दर्पण जैसी निर्मल धारा,
जिसमें बहता नीर अपारा,
अर्पण-तर्पण करने वाली,
सरल-विरल चंचल-मतवाली,
पौधों में भरती हरियाली,
अमल-धवल आधार कहाँ है।
गंगा की वो धार कहाँ है।।
--
भवसागर से पार लगाती,
कष्ट-क्लेश को दूर भगाती,
जो अपने पुरखों की थाती,
उसका दुख अब कौन हरेगा?
गंगा निर्मल कौन करेगा?
जल का स्रोत अपार कहाँ है।
गंगा की वो धार कहाँ है।।
--
शंकर ने सिर पर बैठाया,
धरती ने आँचल फैलाया,
तब गंगा ने पाँव बढ़ाया,
जन-जन ने आनन्द मनाया,
ऋषि-मुनियों ने शीश नवाया,
शिव का वो संसार कहाँ है।
गंगा की वो धार कहाँ है।।
--
भरा प्रदूषण इसमें भारी,
नष्ट हुई पावनता सारी,
आहत हैं सारे नर-नारी,
जिसका करते पूजन-वन्दन,
जिसका करते थे अभिनन्दन,
कुदरत का शृंगार कहाँ है।
गंगा की वो धार कहाँ है।।
--
कलश कहाँ है अब अमृत का,
भटक रहा है पथिक सुपथ का,
पहिया जाम हुआ है रथ का,
कभी धाम था सदाचार का,
वहाँ गरल है अनाचार का,
हर-हर का हरद्वार कहाँ है।
गंगा की वो धार कहाँ है।।
--
कलियुग का प्रभाव सबल है,
मानव के कर्मों का फल है,
तप और त्याग हुआ निष्फल है,
सुरभित-पुष्पित नहीं चमन है,
वीराना अपना उपवन है,
भागीरथ का प्यार कहाँ है।
गंगा की वो धार कहाँ है।।
--
बिगड़ा नहीं अभी कुछ ज्यादा,
मन में हो यदि ठोस इरादा,
पथ बिल्कुल है सीधा-सादा,
व्रत लो गंगा साफ करेंगे,
नदियाँ दूषित नहीं करेंगे,
जहाँ चाह है, राह वहाँ है।
पावन जल की धार यहाँ है।।
--

8 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार 14 दिसंबर 2020 को 'जल का स्रोत अपार कहाँ है' (चर्चा अंक 3915) पर भी होगी।--
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

    जवाब देंहटाएं
  2. शानदार ,गंगा के प्रदूषण पर सटीक सवाल उठाती अभिव्यक्ति।
    साथ ही अभी देरी नहीं हुई ठीक हो सकता है का आश्वासन।

    जवाब देंहटाएं
  3. गंगा की वह वह धार कहाँ है...सटीक प्रश्न उठाती रचना के लिए बधाई|

    जवाब देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails