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मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

ग़ज़ल "हलाहल पिला दिया तुमने" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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दर्द का सिलसिला दिया तुमने
आज रब को भुला दिया तुमने
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हमने करना वफा नहीं छोड़ा
नफरतों का सिला दिया तुमने
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खिलती चम्पा को नोंचकर फेंका
फिर नया गुल खिला दिया तुमने
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हमको आब-ए-हयात के बदले
फिर हलाहल पिला दिया तुमने
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मौत माँगी थी हमने मौला से
फिर से मुर्दा जिला दिया तुमने
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छाँव कैसे मिलेगी बरगद की
पेड़ जड़ से हिला दिया तुमने
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'रूप' की इस हसीन वादी में
इश्क में विष मिला दिया तुमने
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6 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे ब्लॉग ग़ज़लयात्रा पर आपका स्वागत है। इसमें आप भी शामिल हैं-

    http://ghazalyatra.blogspot.com/2020/12/blog-post.html?m=1
    किसान | अन्नदाता | ग़ज़ल | शायरी
    ग़ज़लों के आईने में किसान
    - डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  2. हमको आब-ए-हयात के बदले
    फिर हलाहल पिला दिया तुमने
    -- सुन्दर सृजन।

    जवाब देंहटाएं
  3. छाँव कैसे मिलेगी बरगद की
    पेड़ जड़ से हिला दिया तुमने

    सुंदर सृजन...

    जवाब देंहटाएं

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