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शनिवार, 12 दिसंबर 2020

गीत "काँटों ने उलझाया मुझको" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जीवन के इस दाँव-पेंच में,
मैंने सब कुछ हार दिया है।
छला प्यार में जिसने मुझको,
उससे मैंने प्यार किया है।।
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जब राहों पर कदम बढ़ाया,
काँटों ने उलझाया मुझको।
गुलशन के जब पास गया तो,
फूलों ने ठुकराया मुझको।
जिसको दिल की दौलत सौंपी,
उसने ही प्रतिकार लिया है।
छला प्यार में जिसने मुझको,
उससे मैंने प्यार किया है।।
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संघर्षों के आँधी ने जब,
नदिया में नौका भटकाई।
तब-तब बहुत सावधानी से,
मैंने थी पतवार चलाई।
डूब गया मैं तट पर आकर,
गहरा सागर पार किया है।
छला प्यार में जिसने मुझको,
उससे मैंने प्यार किया है।।
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बनकर कृष्ण-कन्हैया कब से,
खोज रहा हूँ मैं राधा को।
पगडण्डी से रोज-रोज ही,
हटा रहा हूँ मैं बाधा को।
ठगा मोहनी मुस्कानों ने,
मैंने जब मनुहार किया है।
छला प्यार में जिसने मुझको,
उससे मैंने प्यार किया है।।
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5 टिप्‍पणियां:

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