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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

बालकविता "श्रम के लिए बना है जीवन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चिड़िया रानी फुदक-फुदक कर,
मीठा राग सुनाती हो।
आनन-फानन में उड़ करके,
आसमान तक जाती हो।।
--
मेरे अगर पंख होते तो,
मैं भी नभ तक हो आता।
पेड़ो के ऊपर जा करके,
ताजे-मीठे फल खाता।।
--
जब मन करता मैं उड़ कर के,
नानी जी के घर जाता।
आसमान में कलाबाजियाँ कर के,
सबको दिखलाता।।
--
सूरज उगने से पहले तुम,
नित्य-प्रति उठ जाती हो।
चीं-चीं, चूँ-चूँ वाले स्वर से ,
मुझको रोज जगाती हो।।
--
तुम मुझको सन्देशा देती,
रोज सवेरे उठा करो।
अपनी पुस्तक को ले करके,
पढ़ने में नित जुटा करो।।
--
चिड़िया रानी बड़ी सयानी,
कितनी मेहनत करती हो।
एक-एक दाना बीन-बीन कर,
पेट हमेशा भरती हो।।
--
अपने कामों से मेहनत का,
पथ हमको दिखलाती हो।।
श्रम के लिए बना है जीवन,
सीख यही सिखलाती हो।
--

9 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (१२-१२-२०२०) को 'मौन के अँधेरे कोने' (चर्चा अंक- ३९१३) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत प्यारा सा बालगीत

    नमन आदरणीय 🙏

    जवाब देंहटाएं
  3. आदरणीय,

    मेरे ब्लॉग "ग़ज़लयात्रा" में आपका स्वागत है। इसमें आप भी शामिल हैं-

    https://ghazalyatra.blogspot.com/2020/12/blog-post_70.html?m=1

    गंगा | कुछ ग़ज़लें | कुछ शेर | डॉ. वर्षा सिंह
    ग़ज़लों में गंगा की उपस्थिति
    - डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  4. सुन्दर,सरस-सरल कविता मन को भा गई.

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर प्रेरक रचना....
    सादर नमन 🌹🙏🌹

    जवाब देंहटाएं

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