शनिवार, 12 मार्च 2016

मेरे दो मुक्तक "समय का चक्र चलता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कहीं चन्दा चमकता है, कहीं सूरज निकलता है,
नहीं रुकता, नहीं थकता, समय का चक्र चलता है।
लड़ा तूफान से जो भी, सिकन्दर बन गया वो ही,
उजाले के लिए रातों में, नन्हा दीप जलता है।।
--
सम्भल कर पग बढ़ा आगे, बड़ी संगीन राहे हैं,
समन्दर की लहर में भी छिपीं, गमगीन आहे हैं।
मुसाफिर खो नहीं जाना, कहीं पुरनूर गलियों में,
पनपती हैं सभी के दिल में, तो रंगीन चाहे हैं।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार( 11-06-2021) को "उजाले के लिए रातों में, नन्हा दीप जलता है।।" (चर्चा अंक- 4092) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.


    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुन्दर मुक्तक हैं शास्त्री जी साधुवाद !

      हटाएं
  2. बहुत सुंदर संदेश भरे मुक्तक । आपको मेरा सादर अभिवादन एवम नमन आदरणीय शास्त्री जी ।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत ही सुंदर सृजन सर।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत हु सुन्दर मुक्तक..
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं
  5. प्रेरणा प्रद गुरुदेव सृजन को नमन है

    जवाब देंहटाएं
  6. बेहतरीन सृजन दर्शन से भरपूर

    जवाब देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।