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शनिवार, 29 सितंबर 2018

दोहे "रहा जगत में काम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रखना सोच-विचार कर, लोगों से अनुबन्ध।
कच्चे धागे की तरह, होते हैं सम्बन्ध।।

उपनिवेश का आदमी, बन बैठा उपवेश्य।
खाना-पीना-खेलना, अब उसका उद्देश्य।।

दाँव-पेंच में तो नहीं, होता कोई दक्ष।
पारदर्शिता से रखो, न्यायालय में पक्ष।।

पहले जैसा तो नहीं, रहा जगत में काम।
काम-काम में हो रहा, मानव अब बदनाम।।

बदल गयीं है नीतियाँ, बदल गये अब ढंग।
देख मनुज का आचरण, गिरगिट भी है दंग।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (01-10-2018) को "राधे ख्यालों में खोने लगी है" (चर्चा अंक-3111) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    जवाब देंहटाएं
  2. सम्बन्ध कच्चे धागे से ही रहते हैं उम्र भर ... लाजवाब दोहा ...
    और भी सभी दोहे बेहतरीन हैं ...

    जवाब देंहटाएं
  3. रखना सोच-विचार कर, लोगों से अनुबन्ध।
    कच्चे धागे की तरह, होते हैं सम्बन्ध।।

    उपनिवेश का आदमी, बन बैठा उपवेश्य।
    खाना-पीना-खेलना, अब उसका उद्देश्य।।

    दाँव-पेंच में तो नहीं, होता कोई दक्ष।
    पारदर्शिता से रखो, न्यायालय में पक्ष।।

    पहले जैसा तो नहीं, रहा जगत में काम।
    काम-काम में हो रहा, मानव अब बदनाम।।

    बदल गयीं है नीतियाँ, बदल गये अब ढंग।
    देख मनुज का आचरण, गिरगिट भी है दंग।।
    बहुत सुन्दर अति -उत्कृष्ट रचना शास्त्री जी की :
    शिव भक्ति ने देखिये ,बदले कितने रंग ,
    राहुल को चढ़ने लगी बिना पिए ही भंग।
    kabeerjio.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं

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