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बुधवार, 21 अगस्त 2019

ग़ज़ल "साथ चलना सीखिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आदतें अपनी बदलना सीखिए
जिन्दगी में साथ चलना सीखिए

कंकड़ों और पत्थरों की राह में
ठोकरें खाकर सँभलना सीखिए

दुःख और सुख जिन्दगी के अंग हैं
फूल के मानिन्द खिलना सीखिए

खूशनुमा फिर से बहारें आयेंगी
साफगोई रखके मिलना सीखिए

प्यार का धागा-सूईं लेकर जरा
चाके-दिल को आप सिलना सीखिए

दोजहाँ में लोग हैं जालिम बड़े
अश्क को अपने निगलना सीखिए

चीरती है जो अँधेरा रात का
उस शमा जैसा पिघलना सीखिए

गैर को अपना बनाने के लिए
प्यार के साँचे में ढलना सीखिए

हर जगह हैं जाल फैले रूप के
काटकर फन्दे निकलना सीखिए

2 टिप्‍पणियां:

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