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बुधवार, 16 दिसंबर 2020

गीत " ठिठुर रही है सबकी काया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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मैदानों में कुहरा छाया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
 
सूरज को बादल ने घेरा,
शीतलता ने डाला डेरा,
ठिठुर रही है सबकी काया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
कलियों पर मौसम के पहरे,
बहुत निराश हो रहे भँवरे,
गुंजन उनको रास न आया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
--
सरसों के सब बिरुए रोते,
गेहूँ अपना धीरज खोते है,
हरियाली का हुआ सफाया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
 --
बया नीड़ से झाँक रही है,
इधर-उधर को ताँक रही है,
शीतलता ने हाड़ कँपाया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
 
बूढ़े-बच्चे काँप रहे हैं,
सभी आग को ताप रहे हैं,
हिम पर्वशिखरों पर छाया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
--

8 टिप्‍पणियां:

  1. बूढ़े-बच्चे काँप रहे हैं,
    सभी आग को ताप रहे हैं,
    हिम पर्वशिखरों पर छाया।
    सितम बहुत सरदी ने ढाया।।


    सुन्दर गीत.....सच में सर्दी ने बड़ा सितम ढाया हुआ है....

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 17.12.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा| आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
  3. बूढ़े-बच्चे काँप रहे हैं,
    सभी आग को ताप रहे हैं,
    हिम पर्वशिखरों पर छाया।
    सितम बहुत सरदी ने ढाया।।


    आदरणीय, बिलकुल यही दशा यहां मेरे शहर सागर में भी है। कड़ाके की सर्दी पड़ रही है।
    बहुत अच्छा गीत है।
    साधुवाद

    जवाब देंहटाएं
  4. सरसों के सब बिरुए रोते,
    गेहूँ अपना धीरज खोते है,
    हरियाली का हुआ सफाया।
    सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
    बेहतरीन गीत आदरणीय।

    जवाब देंहटाएं

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