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मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

दोहे "खेती का कानून" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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नभ में सूरज गुम हुआ,  हाड़ कँपाता शीत।
दाँतों से बजने लगा, किट-किट का संगीत।।
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दिवस हुए छोटे बहुत, लम्बी हैं अब रात।
खाने में अब बढ़ गया, भोजन का अनुपात।।
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कोयल और कबूतरी, सेंक रहे हैं धूप।
बिना नहाये लग रहा, मैला उनका रूप।।
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अच्छा लगता है बहुत, शीतकाल में घाम।
खिली गुनगुनी धूप में, सिक जाता है चाम।।
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छाया है कुहरा सघन, थर-थर काँपे गात।
सत्याग्रह से कृषक के, विकट हुए हालात।।
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छोड़ दीजिए कृषक पर, खेती का कानून।
नहीं किसानों को रुचा, सरकारी मजमून।।
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खेतीहर-मजदूर हैं, धरती के भगवान।
उनकी जायज माँग का, रखना होगा मान।।
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9 टिप्‍पणियां:

  1. सही बात कही सर! सरकार को किसानों की माँग पर गौर करके इन कानूनों को तुरंत वापस लेना चाहिए।

    जवाब देंहटाएं
  2. खेतीहर-मजदूर हैं, धरती के भगवान।
    उनकी जायज माँग का, रखना होगा मान।।
    बिल्कुल सही।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर और प्रासंगिक दोहे।

    जवाब देंहटाएं
  4. अत्यंत समसामयिक दोहे...

    नमन आपको आदरणीय 🍁🙏🍁

    जवाब देंहटाएं
  5. नमन मान्यवर बहुत सुन्दर रचना।

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर।
    प्रासंगिक समसामयिक दोहे।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
  7. नभ में सूरज गुम हुआ, हाड़ कँपाता शीत।
    दाँतों से बजने लगा, किट-किट का संगीत।।

    सुंदर दोहे...शीतकाल और आज के समय के ज्वलंत मुद्दों को अच्छी तरीके से दर्शाते हुए....

    जवाब देंहटाएं

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