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बुधवार, 2 दिसंबर 2020

गीत "खार पर निखार है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

शराब का चलन बढ़ा, खुमार ही खुमार है।
बेवजह गुरूर का, चढ़ा हुआ बुखार है।।
--
मुश्किलों में हों भले, फिर धुन में मस्त है,
ताप के प्रकोप से, लोग रोग ग्रस्त हैं,
आन-बान, शान-दान, स्वार्थ में शुमार है।
बेवजह गुरूर का, चढ़ा हुआ बुखार है।।
--
हो गये उलट-पलट, वायदे समाज के,
दीमकों ने चाट लिए, कायदे रिवाज़ के,
प्रीत के विमान पर, सम्पदा सवार है।
बेवजह गुरूर का, चढ़ा हुआ बुखार है।।
--
वायदों पे आज, लोकतन्त्र है लदा हुआ,
षटपदों के गान पर, फूल हर फिदा हुआ,
गुल गुलाम बन गये, खार पर निखार है।
बेवजह गुरूर का, चढ़ा हुआ बुखार है।।
--
झूठ के प्रभाव से, सत्य है डरा हुआ,
बेबसी की मार से, आदमी मरा हुआ,
राक्षश प्रसन्न है, देव बेकरार है।
बेवजह गुरूर का, चढ़ा हुआ बुखार है।।

--

7 टिप्‍पणियां:

  1. झूठ के प्रभाव से, सत्य है डरा हुआ,
    बेबसी की मार से, आदमी मरा हुआ,
    राक्षश प्रसन्न है, देव बेकरार है।
    बेवजह गुरूर का, चढ़ा हुआ बुखार है।।
    बहुत सुंदर।

    जवाब देंहटाएं
  2. अच्छे बुरे का भेद मिट गया है

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 3.12.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
  4. वन्दन
    सुन्दर प्रस्तुति.. सामयिक रचना

    जवाब देंहटाएं
  5. वायदों पे आज, लोकतन्त्र है लदा हुआ,
    षटपदों के गान पर, फूल हर फिदा हुआ,
    गुल गुलाम बन गये, खार पर निखार है।
    बेवजह गुरूर का, चढ़ा हुआ बुखार है।।

    बहुत अच्छा गीत
    गेयता के साथ संदेश का सुंदर सम्मिश्रण

    जवाब देंहटाएं
  6. वायदों पे आज, लोकतन्त्र है लदा हुआ,
    षटपदों के गान पर, फूल हर फिदा हुआ,
    गुल गुलाम बन गये, खार पर निखार है।
    बेवजह गुरूर का, चढ़ा हुआ बुखार है।। अर्थपूर्ण रचनाएं चाहे दोहे हों या बाल गीत हमेशा अद्वितीय रचनाएँ - - नमन सह।

    जवाब देंहटाएं

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