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शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

मुक्तक गीत "सदा गुणगान करते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



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मधुर पर्यावरण जिसनेबनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसनेसजाया और सँवारा है।
बहुत आभार है उसकाबहुत उपकार है उसका,
दिया माटी के पुतले कोउसी ने प्राण प्यारा है।।
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बहाई ज्ञान की गंगामधुरता ईख में कर दी,
कभी गर्मीकभी वर्षाकभी कम्पन भरी सरदी।
किया है रात को रोशनदिये हैं चाँद और तारे,
अमावस को मिटाने कोदियों में रोशनी भर दी।।
मधुर पर्यावरण जिसनेबनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसनेसजाया और सँवारा है।।
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लगा जब रोग का सदमातो उसने ही दवा दी है,
कुहासे को मिटाने कोउसी ने तो हवा दी है।
जो रहते जंगलों मेंभीगते बारिश के पानी में,
उन्ही के वास्ते झाड़ी मे कुटिया सी छवा दी है।।
मधुर पर्यावरण जिसनेबनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसनेसजाया और सँवारा है।।
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सुबह और शाम को मच्छर, सदा गुणगान करते हैं,
जगत के उस नियन्ता कोसदा प्रणाम करते हैं।
मगर इन्सान है खुदगर्ज कितना आज के युग में ,
विपत्ति जब सताती हैनमन शैतान करते है।।
मधुर पर्यावरण जिसनेबनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसनेसजाया और सँवारा है।।
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1 टिप्पणी:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार(0२-०२-२०२०) को "बसंत के दरख्त "(चर्चा अंक - ३५९९) पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    -अनीता सैनी

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