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शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

दोहे "नागफनी का रूप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सुमन ढालता स्वयं को, काँटों के अनुरूप।
नागफनी का भी हमें, सुन्दर लगता रूप।
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सियासती दरवेश अब, नहीं रहे अनुकूल।
मजबूरी में भा रहे, नागफनी के फूल।।
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फूलों के बदले मिलें, उपवन में जब शूल।
ऐसा लगता गन्ध को, भ्रमर गये हैं भूल।।
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देश-काल-परिवेश के, बदल गये हैं अर्थ।
उनको सारी छूट हैं, जो हैं आज समर्थ।।
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कैसे रक्खें सन्तुलन, थमता नहीं उबाल।
पापी मन इंसान का, करता बहुत बबाल।।
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अब मौसम के साथ में, बदल गया परिवेश।
काँटे भी देने लगे, गुलशन में उपदेश।।
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नागफनी के चमन में, काँटों की चौपाल।
वासन्ती परिवेश में, जीवन है बदहाल।।
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निखरा-निखरा व्योम है, खिली हुई है धूप।
निखर गया मधुमास में, नागफनी का रूप।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की शनिवार(२९-०२-२०२०) को शब्द-सृजन-१० ' नागफनी' (चर्चाअंक -३६२६) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. नागफनी के चमन में, काँटों की चौपाल।
    वासन्ती परिवेश में, जीवन है बदहाल।।

    बहुत ही सुंदर सृजन सर ,सादर नमन










    बहुत ही सुंदर सृजन सर ,सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर और आकर्षक सृजन आदरणीय।

    जवाब देंहटाएं
  4. सियासती दरवेश अब, नहीं रहे अनुकूल।
    मजबूरी में भा रहे, नागफनी के फूल।।
    सादर प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं

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