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गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

ग़ज़ल "गमों के बोझ का साया बहुत घनेरा है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सियाह रात है, छाया बहुत अन्धेरा है
अभी तो दूर तलक भी नहीं सवेरा है

अभी तो तुमसे बहुत दिल के राज़ कहने हैं
मगर फलक़ पे लगा बादलों का डेरा है

छटेंगी काली घटाएँ तो बोल निकलेंगे
गमों के बोझ का साया बहुत घनेरा है

हमारे घोंसलों में जिन्दगी सिसकती है
कुछ दरिन्दों ने आज अपना मुल्क घेरा है

कभी न जाओ रूप बन-सँवर के राहों में
कदम-कदम पे खड़ा अज़नबी लुटेरा है

5 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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  2. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (07-02-2020) को "गमों के बोझ का साया बहुत घनेरा "(चर्चा अंक - 3604) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है ….
    अनीता लागुरी 'अनु '

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  4. कभी न जाओ रूप बन-सँवर के राहों में
    कदम-कदम पे खड़ा अज़नबी लुटेरा है

    बहुत खूब.... ,लाज़बाब... बिलकुल सही फ़रमाया आपने ,सादर नमस्कार सर

    जवाब देंहटाएं
  5. लयबद्ध शायरी ... लाजवाब शास्त्री जी

    जवाब देंहटाएं

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