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शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

गीत "जालजगत की शाला है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



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जीवन में अँधियारा, लेकिन सपनों में उजियाला है।
आभासी दुनिया में होता, मन कितना मतवाला है।।
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चहक-महक होती बसन्त सी, नहीं दिखाई देती है,
आहट नहीं मगर फिर भी, पदचाप सुनाई देती है,
वीरानी बगिया को जो, पल-पल अमराई देती है,
शिथिल अंग में यौवन की, आभा अँगड़ाई लेती है,
कभी नहीं मुरझाती, सुमनों की ये मंजुल-माला है।
आभासी दुनिया में होता मन कितना मतवाला है।।
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मौसम चाहे कोई भी तो, पलता है मधुमास सदा,
स्वप्न दिखाती स्वर्गलोक के, आकर परियाँ यदा-कदा,
आभासी दुनिया की होती, बहुत निराली प्रियंवदा,
यहाँ दिखाई देती सबको, धरा-गगन की अलग अदा,
पाठ पढ़ाती बिना दाम के, जालजगत की शाला है।
आभासी दुनिया में होता, मन कितना मतवाला है।।
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जैसी जिसकी रुचियाँ होतीं, वैसा इसमें माल भरा,
बंजर नहीं कभी होती है, चन्दनवन की वसुन्धरा,
सपनों की आजादी पर, कैसे सैनिक कैसा पहरा
पठन-मनन का इस बगिया से, होता है नाता गहरा,
माया नगरी के महलों में, रहता सदा उजाला है।
आभासी दुनिया में होता, मन कितना मतवाला है।।
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भाँति-भाँति के रंग उभरते, पल-पल जिसके आँचल पर,
दृष्टि हमेशा जिसकी रहती, विश्वपटल की हलचल पर,
जहाँ निरन्तर बहती रहती, गंगा-यमुना भूतल पर,
रत्नों का भण्डार खोज लो, जा करके सागर-तल पर,
अमल-धवल ये लोक अनोखा, लगता भोला-भाला है।
आभासी दुनिया में होता, मन कितना मतवाला है।।
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2 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (09-02-2020) को "हिन्दी भाषा और अशुद्धिकरण की समस्या" (चर्चा अंक 3606) पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

    आप भी सादर आमंत्रित है

    जवाब देंहटाएं

  2. अमल-धवल ये लोक अनोखा, लगता भोला-भाला है
    आभासी दुनिया में होता, मन कितना मतवाला है

    बहुत खूब..... सर ,सादर नमन

    जवाब देंहटाएं

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