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मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

दोहे "चढ़ा केजरी रंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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केसरिया को छोड़कर, चढ़ा केजरी रंग।
मोह देहली का हुआ, केसरिया से भंग।।
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सारे एग्जिटपोल के, सही हुए अनुमान।
बी.जे.पी. अध्यक्ष का, टूटा गर्व-गुमान।।
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जनता अच्छे काम का, देती है ईनाम।
धन-बल पर चलता नहीं, कोई कहीं निजाम।।
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लड़ते सभी चुनाव को, मुद्दे लिए अनेक।
शासन करता है वही, जिसकी नीयत नेक।
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लेकर काम-कमान को, लड़ा केजरीवाल।
झाड़ू की रौशन हुई, फिर से आज मशाल।।
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दूषित वातावरण के, रहती सदा खिलाफ।
कूड़े-कचरे को सदा, झाड़ू करती साफ।।
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दुनिया में सबसे बड़ा, भारत में जनतन्त्र।
सत्य-अहिंसा-प्रेम के, जहाँ गूँजते मन्त्र।।
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