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शनिवार, 28 अगस्त 2021

दोहे "नहीं किसी का जोर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सत्ता-सिंहासन गये, है इतिहास गवाह।
अमर नहीं कोई हुआ, जग में योगी-शाह।।

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चाहे कितने चाटिये, ताकत के अवलेह।

अमर नहीं रहती कभी, पंच तत्व की देह।।

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जब तक प्राण शरीर में, सभी मनाते खैर।

धड़कन जब थम जाय तो, हो जाते सब गैर।।

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विधि के अटल विधान पर, नहीं किसी का जोर।

पूजन वन्दन साधना, करते भाव विभोर।।

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रहने काबिल जीव के, जब तक रहे शरीर।

 तब तक जीवन-नाव की, खुली रहे जंजीर।।

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किसकी कितनी है उमर, नहीं किसी को ज्ञान।

चित्रगुप्त के गणित से, सब ही हैं अनजान।।

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कहीं शोक की धुन बजे, कहीं मांगलिक गीत।

पड़ती सबको झेलनी, गरमी-बारिश-शीत।।

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जीवन के संग्राम में, होना नहीं निराश।

मंजिल पाने के लिए, करना राह तलाश।।

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बहते निर्झर ही करें, कल-कल शब्द निनाद।

कर्मों से ही व्यक्ति को, रक्खा जाता याद।।

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1 टिप्पणी:

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