मंगलवार, 1 मार्च 2016

"कैद हो गया आज सिकन्दर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


उड़ता था उन्मुक्त कभी जो नीले-नीले अम्बर में।
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

अपनी बोली भूल गया है,
मिट्ठू-मिट्ठू कहता है,
पिंजड़े में घुट-घुटकर जीता,
दारुण पीड़ा सहता है,
कृत्रिम झूला रास न आता, तोते को बन्दीघर में
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

चंचल-चपल तोतियों के,
हो गये आज दर्शन दुर्लभ,
रास-रंग के स्वप्न सलोने,
अब जीवन में नहीं सुलभ,
बहता पानी सिमट गया है, घर की छोटी गागर में।
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

स्वादभरे अपनी मर्जी के,
आम नहीं खा पाएगा,
फुर्र-फुर्र उड़कर नभ में,
अब करतब नहीं दिखाएगा,
तैराकी को भूल गया है, नाविक फँसा समन्दर में।
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

छूट  गये हैं संगी-साथी,
टूट गये है तार सभी,
बन्दी की किस्मत में होता,
नहीं मुक्त संसार कभी,
उम्रकैद की सजा मिली है, नारकीय भवसागर में।
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

इन्सानों की बस्ती में भी,
मिला नहीं इन्सान कोई, 
दिलवालों की दुनिया में भी,
रहा नहीं रहमान कोई,
दानवता छिपकर बैठी है, मानवता की चादर में।
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

प्रजातन्त्र की हथकड़ियों में,
आजादी दम तोड़ रही,
सत्ता की आँगनबाड़ी,
जनता का रक्त निचोड़ रही,
परिधानों को छोड़, खोजता सच्चा सुख आडम्बर में।
कैद हो गया आज सिकन्दर सोने के सुन्दर घर में।।

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