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रविवार, 1 अप्रैल 2018

संस्मरण "फर्स्ट अप्रैल और मेरे पिता जी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

वो फर्स्ट अप्रैल
वाकया 2013 का है। उस समय मेरे पिता श्री घासीराम जी की आयु 90 वर्ष की है। 90 साल की उम्र में भी वे अपने दैनिक कार्य स्वयं ही करते हैं। यों तो उनके लिए निचली मंजिल पर भी स्नानगृह बना है। मगर उसमें गीजर नही लगा है। इसलिए पूरे जाड़ों-भर वह प्रति दिन सुबह 10 बजे स्नान करने के लिए ऊपर ही आ जाते हैं।
       उस दिन एक अप्रैल का दिन था। पिता जी स्नान के लिए आये और नहा कर जब बाहर निकले तो उनके पूरे शरीर पर नील पुता था।
       हम सब यह देख कर आश्यर्यचकित हो गये। जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि नहाने के बाद प्लास्टिक की शीशी में से तेल लगाया था।
       हमें यह समझते देर न लगी कि इन्होंने उजाला नील की शीशी में से शरीर पर नील पोत लिया है।
      मेरा पौत्र प्राञ्जल की आयु उस समय 14 वर्ष की थी। उसने अपने पड़बाबा जी से कहा कि बाबा जी आपको आज मैं साबुन से नहलाऊँगा। इतना कह कर वह मेरे पिता जी को बाथरूम में दोबारा ले गया और बड़े प्रेम से उन्हें साबुन से मल-मल कर नहलाया! 

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (02-04-2018) को ) "चाँद की ओर निकल" (चर्चा अंक-2928) पर होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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