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रविवार, 1 अप्रैल 2018

दोहे "मूरखपन का खेल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मूरख दिवस मना रहे, लोग शान से आज।
गुणवन्तों के दिवस का, कोई नहीं रिवाज।।
--
लोगों को रुचने लगा, मूरखपन का खेल।
 मूरख की संसार में, खूब फैलती बेल।।
--
जो सुपात्र हैं जगत में, वो हैं आज उदास।
मगर निठल्लों के भरा, तन-मन में उल्लास।।
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बेवकूफ खुश हो रहे, देख निराले ढंग।
उनके जीवन में भरे, अब तो सातों रंग।।
--
ज्ञानी भी मूरख बनें, कैसी है ये रीत।
जो गत-विगत बना लिए, गाते वो ही गीत।।
--
होशियार जो हैं यहाँ, परस रहे वो ज्ञान।
लेकिन जग की चाल से, बने हुए अनजान।।
--
एक साल में एक दिन, बेवकूफ का होय।
बेवकूफ तो शेष दिन, शीश पकड़ कर रोय।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (02-04-2018) को ) "चाँद की ओर निकल" (चर्चा अंक-2928) पर होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  2. मूरख दिवस पे सटीक और लाजवाब दोहे ...
    बहुत कुछ इशारों इशारों में कहते हुए ...

    उत्तर देंहटाएं

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