|
यज्ञ-हवन करके करो, गुरूदेव का ध्यान।
जग में मिलता है नहीं, बिना गुरू के ज्ञान।।
भूल गया है आदमी, ऋषियों के सन्देश।
अचरज से हैं देखते, ब्रह्मा-विष्णु-महेश।।
गुरू-शिष्य में हो सदा, श्रद्धा-प्यार अपार।
गुरू पूर्णिमा पर्व को, करो आज साकार।।
गुरु की महिमा का करूँ, कैसे आज बखान।
जग में मिलता है नहीं, बिना गुरू के ज्ञान।(१)।
संस्कार देता गुरू, पाता सिख अमिताभ।
बिना दीक्षा के नहीं, शिक्षा का कुछ लाभ।।
अन्तस को दे रौशनी, गुरू ज्योति का पुंज।
गुरु के शुभ आशीष से, सुरभित होय निकुंज।।
सद्गुरु अपने शिष्य को, देता हरदम ज्ञान।
जग में मिलता है नहीं, बिना गुरू के ज्ञान।(२)।
तीन गुरू संसार में, मात-पिता-आचार्य।
इन तीनों की कृपा से, बनते सारे कार्य।।
आया कैसा समय है, बदल गयी है रीत।
गुरुओं के प्रति है नहीं, पहले जैसी प्रीत।।
श्रद्धा के बिन शिष्य का, कैसे हो उत्थान।
जग में मिलता है नहीं, बिना गुरू के ज्ञान। (३)।
दुराचरण की नाक में, कैसे पड़े नकेल।
सम्बन्धों की विश्व में, सूख रही है बेल।।
मर्यादा दम तोड़ती, बिगड़ गया परिवेश।
बदनामी को झेलता, राम-कृष्ण का देश।।
कदम-कदम पर हो रहा, गुरुओं का अपमान।
जग में मिलता है नहीं, बिना गुरू के ज्ञान। (४)।
पश्चिम की अश्लीलता, अपनाते हैं लोग।
भोगवाद को देखकर, सहम गया है योग।।
अब तो पूजा-पाठ से, मोह हो गया भंग।
सी.डी. में ही कर रहे, पण्डित जी सत्संग।।
गिरगिट जैसा रंग अब, बदल रहा इंसान।
जग में मिलता है नहीं, बिना गुरू के ज्ञान।(५)।
|
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |

अब तो पूजा-पाठ से, मोह हो गया भंग।
जवाब देंहटाएंसी.डी. में ही कर रहे, पण्डित जी सत्संग।।
आज के पूरे परिवेश को समेटे है ये दोहावली। गुरु किसी शरीर का नाम नहीं है।
ज्ञान ही गुरु है और गुरु ही ज्ञान है,
चाहे इसे श्री गुरुग्रंथसाहब कहो ,गीता या कुरआन कहो।
गुरु ही जीपीएस है ,व्यापक गुरु का ज्ञान ,
मद माया के अंध तू जान सके तो जान।
अति सारगर्भित दोहावली सुप्रिया शास्त्री जी की।