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सोमवार, 13 अगस्त 2018

दोहे "काँटे और गुलाब" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


सीमाओं पर हो रहा, बद से बदतर हाल। 
रोज काल है लीलता, माताओं के लाल।।

जनमानस की है यहाँ, याददाश्त कमजोर। 
इसीलिए हैं जीतते, लोकतन्त्र में चोर।।

नेताओं की बात से, जनता में है रोष। 
एक दूसरे पर सभी, लगा रहे हैं दोष।।

शस्यश्यामला धरा से, नष्ट हो रहे फूल। 
उपवन में उगने लगे, चारों ओर बबूल।।

धरती पर सूखा पड़े, या आये सैलाब। 
साथ-साथ फिर भी रहें, काँटे और गुलाब।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ भी हो कांटे और गुलाब का साथ बना ही रहता है
    सूखी लकड़ी के साथ गीली भी जल जाती है और फूलों के साथ काँटों की भी सिंचाई हो जाती है
    बहुत अच्छी रचना

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर |
    स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें

    जवाब देंहटाएं

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