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बुधवार, 22 अगस्त 2018

"ज्येठ भ्राता सम मेरे बहनोई मा. रघुनन्दन प्रसाद"

ज्येष्ठभ्राता समान मेरे बड़े बहनोई 
स्व. रघुनन्दन प्रसाद
   पिछले माह आठ जुलाई, 2018 को मैं अपने बड़े बहनोई श्री रघुनन्दन प्रसाद जी अवकाशप्राप्त प्रवक्ता (हिन्दी) को देखने के लिए मुरादाबाद गया था। उसके 20 दिन पहले वह अपने भतीजे अरविन्द की पुत्री का रिश्ता करने के लिए टनकपुर आये थे। काफी कमजोर लग रहे थे। फिर अचानक पता लगा कि उनके मस्तिष्क में कैंसर की तीन गाँठें हैं और उसका दुष्प्रभाव उनके फेफड़ों तक भी हो गया है। अतः मैं उनसे मिलने के लिए छोटे पुत्र विनीतपुत्रवधु पल्लवी और श्रीमती जी के साथ गया।
    बातों-बातों में पता लगा कि आठ जुलाई उनका 78वाँ जन्मदिन है संयोगवश आज भी 8 जुलाई का ही दिन था। इस अवसर पर केक मँगवाया गया। उनको तिलक किया गया। वह बड़े प्रसन्न थे और कह रहे थे कि डॉक्टर साहिव जीवन में पहली बार मैं अपना जन्मदिन मना रहा हूँ। इस अवसर पर उन्होंने सब बच्चों के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद भी दिया। किसे पता था कि यह उनका अन्तिम जन्मदिन का जश्न होगा।
   मास्टर रघुनन्दन प्रसाद जी बहुत ही बुद्धिमान और धीर-गम्भीर व्यक्ति थे। उनमें गहराई इतनी थी कि आज तक उनके परिवार में मेरी बहन रूपवती और उनके दोनों पुत्रों को भी उन्होंने यह पता तक नहीं लगने दिया था कि उनकी तनख्वाह कितनी है और किससे क्या-क्या लेना देना है?
    उनको अच्छे से अच्छे इलाज के लिए उनके दोनों पुत्र दिल्ली तक ले गये परन्तु किसी भी डॉक्टर ने कोई सन्तोषजनक उत्तर न देकर यही कहा कि ये अधिक से अधिक 6 मास तक ही जीवित रहेंगे। यह बात मास्टर साहब को किसी ने नहीं बताई कि उनको कैंसर है। लेकिन मास्टर साहब बुद्धिमान व्यक्ति थे। वे समझ गये थे कि अब अन्त समय निकट है।
    मैंने भी उन्हें संकेतों में यह समझाया कि मास्टर साहब दुनिया में कोई भी व्यक्त अमर नहीं है। क्या पता कि मैं ही आपसे पहले चला जाऊँ। इसलिए आप अपने दोनों पुत्रों को जमीन-मकान से लेकर जो किसी से लेना देना है उसे लिखवा दीजिए। साथ ही उनको रजिस्ट्री वसीयत भी कराने की सलाह देकर आया था और उन्होंने मेरी सलाह को माना भी था। लगभग 25 दिन पहले उन्होंने अपनी वसीयत करा दी थी और अपने सारे बैंक खाते अपनी पत्नी (मेरी बहन) के नाम संयुक्त करा दिये थे।
    एक माह पूर्व जब मैं उनसे मिल कर शाम को वापिस खटीमा लौटने लगा तो उन्होंने जिद करके परिवार वालों को कहा कि मुझे रोड तक ले चलो। मेरी बहन और उनका बड़ा पुत्र उन्हे सहारा देकर नीचे तक लाये।
   अब हम लोग विदा माँगकर चलने लगे तो मास्टर साहब तब तक मुझे देखते रहे जब तक कि मैं उनकी आँखों से ओझल न हो गया। शायद उन्हें यह आभास हो गया था कि अब मेरी और उनकी यह अन्तिम मुलाकात है और अब कभी जीते जी दोबारा वह मुझसे नहीं मिल पायेंगे।
     मेरे साथ विडम्बना यह रही है कि मेरा कोई बड़ा या छोटा भाई नहीं था। इसलिए मैं उन्मुक्त स्वभाव का था। बहन का विवाह हुआ तो मुझे बड़े भाई के रूप में बहनोई रघुनन्दन प्रसाद मिल गये। जो मुझे समय-समय पर सही मार्ग दिखाते रहते थे। इतना ही नहीं मेरे ऊपर जब कभी समाजिक विपत्ति आई तो मास्टर रघुनन्दन प्रसाद ने सदैव मेरा साथ दिया और पथ के काँटे चुनकर मेरी राहों में फूल बिछाये।
    आज मेरे बड़े भाई या पिता तुल्य मेरे सबसे निकटतम सम्बन्धी श्री रघुनन्दन प्रसाद जी का निधन हो गया है। यह मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं जानता है कि किस प्रकार मैंने रो-रोकर यह संस्मरण लिखा होगा। 
     अब मैं भी वृद्ध हो गया हूँ शरीर में पहले जैसा बल भी नहीं है। मेरे खुद के परिवार में मेरे दोनों पुत्र, पुत्रवधुएँ, पत्नी और पौत्र-पौत्री मेरा बहुत ख्याल रखते हैं, सम्मान भी बहुत करते हैं किन्तु अपने बड़े भाई जैसे बहनोई रघुनन्दन प्रसाद जी के निधन से मैं बिल्कुल टूट गया हूँ और खुद को नितान्त अकेला अनुभव करता हूँ।
    मैं परमपिता परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ कि वो उनकी आत्मा को सद्गति प्रदान करें।









5 टिप्‍पणियां:

  1. हिम्मत रखिये। विधी का विधान है। जिसने आना है उसे जाना भी है। नमन और श्रद्धांजलि रघुनन्दन जी के लिये।

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. आदरणीय सर --अपनों के इस तरह जाने की पीड़ा से ऐसा कौन है जो वाकिफ ना होगा |आप तो बहुत ही विद्वान हैं आपको कुछ कह पाने की योग्यता मुझे में नहीं-

    पर साहिर लुधियानवी जी की अमर पंक्तियाँ है -

    उतना ही उपकार समझ -

    कोई जितना साथ निभादे ;

    जन्म मरण का मेल है सपना -

    ये सपना बिसरादे ,

    कोई ना संग मरे !!

    इस जीवन की चढती -ढलती

    धूप को किसने बांधा?

    रंग पे किसने पहरे डाले

    रूप को किसने बांधा ?

    काहे ये जतन करे -

    मन रे तू काहे ना धीर धरे !!!!!!

    हौसला रखे |

    आदरणीय दिवंगत आत्मा को विनम्र श्रद्धांजलि!!

    सादर प्रणाम

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  4. अपने किसी भी प्रिय व्यक्ति के सदा-सदा के लिए चले जाने का दुःख क्या होता है इसका दुःखद अहसास जीवन में सबको ही कभी न कभी होता ही है, हमारे हाथ में कुछ होता नहीं सिवाय धीरज धारण करने के, बस वक़्त-बेवक्त उनकी यादों का आना-जाना लगा रहता है ..........
    हार्दिक श्रद्धांजलि रघुनन्दन जी को!

    जवाब देंहटाएं

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