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शनिवार, 18 अगस्त 2018

दोहे "सिमट गया संसार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बात-बात पर हो रही, आपस में तकरार।
रिश्तों-नातों में नहीं, पहले जैसा प्यार।।

झगड़ा है सुख के लिए, अब अपनों के बीच।
बिन पानी के डूबते, तट पर देखो नीच।।

आपाधापी-स्वार्थ में, सिमट गया संसार।
हरे-भरे परिवेश से, नहीं किसी को प्यार।।

पेड़ घट रहे धरा से, बढ़ता जाता ताप।
झेल रहे हम अवश हो, पीड़ा को चुपचाप।।

देख रीत संसार की, मन हो रहा उदास।
धन-दौलत तो पास है, मगर नहीं उल्लास।।

पंजी-दस्सी-चवन्नी, हुई चलन से दूर।
हुआ अठन्नी-रुपइया, अब कितना मजबूर।।

जब से आया चलन में, दो हजार का नोट।
बढ़ती महँगाई रही, तब से हृदय कचोट।।

1 टिप्पणी:

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