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मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

दोहागीत "जनता का जनतन्त्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कल तक मस्त वज़ीर थे, आज हुए हैं त्रस्त।
निर्वाचन ने दलों के, किये हौसले पस्त।।

शासक सब खाते रहे, नोच-नोचकर देश।
वीराना सा कर दिया, वासन्ती परिवेश।।
छेद स्वयं के पात्र में, करने लगे दलाल।
जनता आहत हो रही , दशा देख विकराल।।
मत के प्रबल प्रहार से, दुर्ग करेगी ध्वस्त।
निर्वाचन ने दलों के, किये हौसले पस्त।।

खाती छोटी मीन को, बड़ी-बड़ी जब मीन।
मठाधीश रहते सदा, अपने सुख में लीन।।
लोकतन्त्र में तब बचा, मत का एक विकल्प।
अच्छों को मत दीजिये, ले करके संकल्प।।
दर-दर ठोकर खा रहे, कल तक जो थे व्यस्त।
निर्वाचन ने दलों के, किये हौसले पस्त।।

काम नहीं करता जहाँ, यन्त्र-तन्त्र का मन्त्र।
टिका यहाँ मतदान पर, जनता का जनतन्त्र।।
खून-खराबे से नहीं, चलता कुछ भी काम।
परिवर्तन करता सदा, लोकतन्त्र में आम।।
जनता बेईमान का, करती सूरज अस्त।
निर्वाचन ने दलों के, किये हौसले पस्त।।

निर्धन को धनवान सा, नहीं सुलभ है न्याय।
कदम-कदम पर बढ़ रहा, भेद-भाव अन्याय।।
भारत माता कर रही, कब से यही पुकार।
भ्रष्ट सियासत की नहीं, भारत को दरकार।।
संसद में पहुँचे नहीं, रिश्वत के अभ्यस्त।
निर्वाचन ने दलों के, किये हौसले पस्त।।

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