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बुधवार, 10 अप्रैल 2019

पुच्छल दोहे "कितने बदल गये हैं बन्दे" डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’



तन के उजले मन के गन्दे।
कितने बदल गये हैं बन्दे।।

शब्दकोश तक रह गयाअब तो जग में प्यार।
केवल सुख के ही लिएकरते सब व्यापार।।
भोग-विलासों में सब अन्धे।
कितने बदल गये हैं बन्दे।।

मतलब में पहचानतेकरते प्यार-अपार।
हित-साधन के बाद मेंदेते हैं दुत्कार।।
निशिदिन फेंक रहे हैं फन्दे।
कितने बदल गये हैं बन्दे।।

ग्राम-नगरपरदेश मेंफैला इनका जाल।
कुटिलचाल चलते हुएकमा रहे है माल।।
दुनिया भर में फैले धन्धे।
कितने बदल गये हैं बन्दे।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 11.4.19 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3302 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. मतलब में पहचानते ...
    सच तो यही है
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं

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