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बुधवार, 3 अप्रैल 2019

दोहे "फैले जिनके हाथ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


केवल मतलब के लिए, जहाँ मधुर हों बात।
जग में ऐसे मीत ही, पहुँचाते आघात।।

लेने के ही नाम पर, फैले जिनके हाथ।
उनसे मत आशा करो, जो हैं स्वयं अनाथ।

सम्बन्धों के नाम पर, हों कोरे अनुबन्ध।
उनसे दुआ-सलाम तक, रहने दो सम्बन्ध।।

याद नहीं रहता जिन्हें, योगदान-अनुपात।
ऐसे लोगों को कभी, देना मत खैरात।।

अपने वचनों के नहीं, होते जो पाबन्द।
उनसे तो कर दीजिए, मेल-जोल भी बन्द।।

मन में मैल भरा हुआ, मुख पर हो मुसकान।
उनको कभी न बाँटिए, अपना निर्मल ज्ञान।।

सूरत भले कुरूप हो, सीरत में हो रूप।
सुबह-शाम लगती सदा, सबको अच्छी धूप।।

जिसके भरा दिमाग में, अधकचरा हो ज्ञान।
उसके मन में तो भरा, होता है अभिमान।।

मन में जिससे प्रीत हो, उसका पकड़ो हाथ।
साथी का मझधार में, नहीं छोड़ना साथ।।

ओज-तेज से युक्त हीकहलाता अमिताभ।
लोग उठाते हैं सदाभोलेपन का लाभ।।

जगतनियन्ता है गुरू, हम सब उसके छात्र।
रटा-रटाया बोलते, रंगमंच के पात्र।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 4.4.19 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3295 में दिया जाएगा

    धन्यवाद सहित

    जवाब देंहटाएं
  2. सीख देते बेहतरीन दोहे

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह ! हर पंक्ति में गहरी सीख है ये जीवन के वृक्ष पर लगे अनुभवों के फल हैं । सादर।

    जवाब देंहटाएं

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