राजनीति
के जाल में, फँसे राम-रहमान।
मन्दिर-मस्जिद
का नहीं, पथ लगता आसान।।
न्यायालय
के न्याय पर, क्यों उठ रहे सवाल।
अरजी पुनर्विचार
की, है अब नया बवाल।।
हिन्दू-मुस्लिम
ने किया, निर्णय था स्वीकार।
लेकिन कुछ
शातिर अभी, झगड़े को तैयार।।
साफ विरासत
का हुआ, न्यायालय में पक्ष।
होंगे दैरो-हरम
के, अलग-अलग अब कक्ष।।
चढ़ा इबादत
में कुटिल, फूटनीति का रंग।
शैतानों
की सोच से, चैन हो रहा भंग।।
हिन्दू
पूजा को करें, मुस्लिम पढ़ें नमाज।
कहते
दोनों पन्थ ये, सुख से रहे समाज।।
सूफी-सन्तों
ने दिया, दुनिया को उपदेश।
अपने
प्यारे देश का, शान्त रखो परिवेश।।
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बहुत खूब ... जलते हुए प्रश्न हैं हर दोहे में ...
जवाब देंहटाएंपर कुछ लोग बस बांटते हैं ...
बिना विवाद के जिनकी दुकान नहीं चलती, भला वो क्यों कोई स्थायी हल चाहेंगे.
जवाब देंहटाएंधर्म-मज़हब के भ्रष्ट ठेकेदार और देश को विवादों के दलदल में फंसाते रहने वाले राजनीतिज्ञ अभी तो भारत पर और भारतीयों पर और भी सितम ढाएँगे.