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गुरुवार, 14 नवंबर 2019

गीत "चढ़ा हुआ बुखार है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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है नशा चढ़ा हुआखुमार ही खुमार है।
तन-बदन में आज तोचढ़ा हुआ बुखार है।।
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मुश्किलों में हैं सभीफिर भी धुन में मस्त है,
ताप के प्रकोप सेआज सभी ग्रस्त हैं,
आन-बानशान-दानस्वार्थ में शुमार है।
तन-बदन में आज तोचढ़ा हुआ बुखार है।।
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हो गये उलट-पलटवायदे समाज के,
दीमकों ने चाट लिएकायदे रिवाज़ के,
प्रीत के विमान परसम्पदा सवार है।
तन-बदन में आज तोचढ़ा हुआ बुखार है।।
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अंजुमन पे आजसारा तन्त्र है टिका हुआ,
आज उसी वाटिका काहर सुमन बिका हुआ,
गुल गुलाम बन गयेखार पर निखार है।
तन-बदन में आज तोचढ़ा हुआ बुखार है।।
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झूठ के प्रभाव सेसत्य है डरा हुआ,
बेबसी के भाव सेआदमी मरा हुआ,
राम के ही देश मेंराम बेकरार है।
तन-बदन में आज तोचढ़ा हुआ बुखार है।।
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2 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (15-11-2019 ) को "नौनिहाल कहाँ खो रहे हैं " (चर्चा अंक- 3520) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिये जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    -अनीता लागुरी 'अनु'

    जवाब देंहटाएं
  2. 'राम बेक़रार है' क्योंकि उसके नाम पर लूट मची है. अब 'मंदिर वहीं बनाएँगे' का नारा लगाना बंद हो गया है और 'मंदिर हमीं बनाएँगे' का नारा लग रहा है. धर्म का बुखार उतर गया है और अब लक्ष्मी जी का बुखार चढ़ रहा है.

    जवाब देंहटाएं

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