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शनिवार, 23 नवंबर 2019

दोहे "जनमानस लाचार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जगह-जगह पर हैं लगीं, लोगों की चौपाल।
सियासती रुख देखकर, होता बहुत मलाल।।
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सियासती दरवेश अब, नहीं रहे अनुकूल।
मजबूरी में भा रहे, नागफनी के फूल।।
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फूलों के बदले मिले, जनता को तो शूल।
नये ढंग से हो रहे, वादे ऊल-जुलूल।।
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राजनीति के आज तो, बदल गये हैं अर्थ।
उपयोगी वो बन गये, जो लगते थे व्यर्थ।।
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कैसे रक्खें सन्तुलन, थमता नहीं उबाल।
खाली मन शैतान का, करता बहुत बवाल।।
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भूखी जनता खा रही, भाषण लच्छेदार।
अब बहरी सरकार में, जनमानस लाचार।।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (२४ -११ -२०१९ ) को "जितने भी है लोग परेशान मिल रहे"(चर्चा अंक-३५२९) पर भी होगी
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
    महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह!!सर ,सुंदर और सटीक दोहे !

    जवाब देंहटाएं

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