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सोमवार, 25 नवंबर 2019

दोहे "मन में पसरा मैल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जनसेवा के नाम पर, मन में पसरा मैल।
निर्धन श्रमिक-किसान तो, कोल्हू के हैं बैल।।
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छँटे हुए सब नगर के, बन बैठे गुणवान।  
पत्रकारिता में बचे, कम ही अब विद्वान।।
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जो समाज की नजर में, कभी रहे बेकार।
वो अब अपने देश में, चला रहे अखबार।।
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पत्रकारिता में हुआ, गोल आज किरदार।
विज्ञापन के नाम पर, चमड़ी रहे उतार।।
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नाजायज जायज बना, करते रकम वसूल।
आय-आय के नाम पर, बिकते आज उसूल।।
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बैतरणी में नरक की, कोई नहीं अनाथ।
राजनीति की मीन पर, मगरमच्छ का हाथ।।
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छुटभइये हों या बड़े, सबकी है अब मौज।
बढ़ती जाती देश में, बाबाओं की फौज।।
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