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मंगलवार, 5 नवंबर 2019

ग़ज़ल "ख़ुदगर्ज़ी का हुआ ज़माना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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नहीं रहा अब समय पुराना
ख़ुदगर्ज़ी का हुआ ज़माना
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कैसे बुने कबीर चदरिया
उलझ गया है ताना-बाना
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पसरी है सब जगह मिलावट
नकली पानी नकली दाना
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देशभक्त हैं दुखी देश में
लूट रहे मक्कार खज़ाना
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आजादी अभिशाप बन गयी
हुआ बेसुरा आज तराना
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दीन-धर्म के फन्दे में है
मानवता का अब अफसाना
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'रूप' देखकर दे देते वो
हमें भीख में कुछ नज़राना
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2 टिप्‍पणियां:

  1. 'रूप' देखकर दे देते वो
    हमें भीख में कुछ नज़राना
    ..व्यवस्था पर सटीक रचना लेकिन क्या करें यही सब नजराना मिल रहा है, जिसकी उम्मीद कभी न रही।

    जवाब देंहटाएं
  2. खरी-खरी कहने का ज़माना नहीं रहा लेकिन आज भी कबीर के अनुगामी उनकी परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं. बहुत सुन्दर और बहुत साहसिक विचार !

    जवाब देंहटाएं

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