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सोमवार, 11 नवंबर 2019

दोहे "गठबन्धन की नाव" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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खींचातानी में हुआ, मोह आपसी भंग।
नूरा-कुश्ती देखकर, लोग रह गये दंग।।
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राजनीति का देश में, इतना बढ़ा खुमार।
सत्ता पाने के लिए, होती मारामार।।
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दशकों से दोनों रहे, सुख-दुख में थे साथ।
लेकिन कुरसी के लिए, छोड़ दिया अब हाथ।।
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नेक-नीति के साथ में, दोनों लड़े चुनाव।
लेकिन डूबी स्वार्थ में, गठबन्धन की नाव।।
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जनता से जो थे किए, मिलकर कौल-करार।
अहम भाव से हो गयी, आपस में तकरार।।
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राजनीति की धूप को, सेंक रहा परिवार।
खानदान के लिए सब, माँग रहे अधिकार।।
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बाहर बने कपोत से, भीतर से हैं काग।
अलग-अलग सुर में सभी, गाते अपने राग।।
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