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मंगलवार, 5 नवंबर 2019

दोहे "लिखने का है रोग (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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देते मुझको हौसला, कदम-कदम पर मीत।
बन जाते हैं इसलिए, ग़ज़लें, दोहे-गीत।।
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शब्द और व्याकरण का, मुझे नहीं कुछ ज्ञान।
इसीलिए करता नहीं, मैं झूठा अभिमान।।
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टंकण कर लेता तभी, जब आते कुछ भाव।
शब्दों में करता नहीं, जोड़-तोड़ बदलाव।।
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गीत-ग़ज़ल दोहे लिखे, किये कई अनुवाद।
रचनाओं से स्वयं की, करता खुद संवाद।।
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नहीं मुझे यह ज्ञात है, कैसे बनते छन्द।
किन्तु नित्य लिखकर मुझे, मिलता है आनन्द।।
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कंकड़-काँटों से भरी, राह बहुत विकराल।
फिर भी प्रतिदिन लक्ष्य पर, सीधी चलता चाल।।
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जब भी आकर घेरते, जीवन में अवरोध।
करवाते हैं भूल का, तब वो मुझको बोध।।
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मेरे मन की बात को, श्लाघा कहते लोग।
लेकिन तन-मन में बसा, लिखने का है रोग।।
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2 टिप्‍पणियां:

  1. डॉक्टर रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ! हमारी प्रार्थना है कि लिखने के इस रोग से आपको कभी मुक्ति न मिले !

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  2. बहुत खूब... सुंदर रचना ,सादर नमन सर

    जवाब देंहटाएं

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