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मंगलवार, 12 नवंबर 2019

समय का फेर (संस्मरण) (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

समय का फेर
(संस्मरण)
       आज से 55 साल पहले की बात है। उस समय मेरी आयु 14-15 साल की रही होगी। मैं तब उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद में रहता था। उस समय यातायात का साधन रेलगाड़ी या बैलगाड़ी, घोड़ा गाड़ी और साइकिल ही थी। उस समय ट्रैक्टर भी नहीं थे। हमारे शहर से सबसे नजदीक सोती का नांगल ग्राम में गंगा घाट था। जो नजीबाबाद से 9 मील दूर था। अतः कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहाँ गंगा स्नान का विशाल मेला लगता था।
      हम लोग सपरिवार इस मेले में जाते थे। मुझे मेरी छोटी बहन के साथ पिता जी साइकिल पर मेले में ले जाते थे। माता जी और मेरी मझली बहन को वे पड़ोसी किसान की बैलगाड़ी में बैठा देते थे और हम लोग 3 दिनों के लिए नांगल चले जाते थे।
      नजीबाबाद में मेरे मिहल्ले रम्पुरे में पिता जी के दूर के रिश्ते के चाचा नन्हें सिंह रहते थे। जो सादगी में अपना जीवन यापन करते थे। उनकी बहन नन्ही नांगल में रहती थी। जिसके पति का नाम तुंगल था। उनके पास गुजर-बसर के लिए थोड़ी सी खेती थी। मगर ये दोनों पति-पत्नी बहुत अच्छे स्वभाव के थे। जो 15 दिन पहले से तैयारी में लग जाते थे कि रम्पुरे मुहल्ले से हमारे रिश्तेदार मेले में आयेंगे और उनको कोई असुविधा न हो। इसलिए वे अपने कच्चे घर और उसके आगे दो छप्परों में पराली बिछाकर सूत का पाल बिछा देते थे। जहाँ सब लोगों के सोने का प्रबन्ध होता था। किस्से-कहानी और गप-शप में रात गुजारते थे। खाने में मिष्ठान के रूप में गुड़ होता था, चने का साग और धान की या मक्की की रोटी नन्हीं दादी और उनकी पुत्री बहुतायत में बनाती थीं। जो हम शहरियों के लिए मोहन-भोग से कम नहीं होती थी। कुछ लोग घर से रोटी बाँधकर लाते थे तो नन्हीं दादी बहुत बुरा मानती थी और यह कहती थी कि क्या हम लोग इस काबिल भी नहीं हैं कि आप लोगों को खाना खिला सकें। सच पूछा जाये तो दादी के यहाँ भण्डारा चलता था और इस काम में पास पड़ोस के 3-4 परिवार भी उनके साथ लगे रहते थे।
        रात्रि विश्राम करके सुबह सब लोग अपने-अपने घरों को प्रस्थान कर जाते थे। और हाँ, एक बात तो बताना भूल ही गया। दादी के घर के बाहर उनका गन्ने का कोल्हू भी था। जहाँ गुड़, शक्कर और राब बनायी जाती थी। जिसे साप्ताहिक हाट में घर की आवश्यकता पूरी करने के लिए बेच दिया जाता था। क्योंकि उन दिनों चीनी मिल या क्रेशर नहीं थे।
     सुबह होते ही सारे मेहमान 2-3 बैलगाड़ियों पर सवार होकर दो कोस दूर गंगाघाट पर लगे विशाल मेले में जाते थे। गाड़ी में ही खिचड़ी, घी, आम और आँवले का अचार, लकड़ी, खिचड़ी पकाने के लिए एक बड़ी देग और गंगाघाट पर खिचड़ी बनती थी। मेले में शाम तक सब लोग आनन्द मनाते मनोरंजन करते थे और फिर दादी के घर लौट आते थे। विदाई के समय नन्हीं दादी और तुंगल दादा सबको गर्म गुड़ भी भेंट में देते थे।
      अब जमाना बहुत बदल गया है। स्वागत सत्कार मात्र चाय और नमस्ते तक ही सिमट कर रह गया है। आज तो वह निश्छल प्यार और नाते-रिश्तों के मतलब ही बदल गये हैं। कितना अन्तर हो है उस समय के जमाने में और आज के जमाने में।

8 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन और दुर्लभ यादें.. अत्यंत सुन्दर संस्मरण आदरणीय .

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  2. मनमोहक संस्मरण। सादर प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते , आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 24 मार्च 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ......
    सादर
    रेणु

    जवाब देंहटाएं
  4. जी नमस्ते , आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 24 मार्च 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ......
    सादर
    रेणु

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह!सर ,बहुत सुंदर संस्मरण 👌👌 सही है अब वो पहले जैसा स्नेह भाव कहाँ ?

    जवाब देंहटाएं
  6. पहले के जमाने को जानने को मिला।
    बहुत सुंदर।

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  7. आज फिर से इस संस्मरण को पढ़कर यही कह सकती हूँ - जाने कहाँ गए वो दिन !!!
    सादर नमन आदरणीय शास्त्रीजी

    जवाब देंहटाएं
  8. लाजवाब संस्मरण....
    अब जमाना बहुत बदल गया है। स्वागत सत्कार मात्र चाय और नमस्ते तक ही सिमट कर रह गया है। आज तो वह निश्छल प्यार और नाते-रिश्तों के मतलब ही बदल गये हैं। कितना अन्तर हो है उस समय के जमाने में और आज के जमाने में।
    एकदम सटीक...

    जवाब देंहटाएं

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