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बुधवार, 15 सितंबर 2021

दोहे "रचता जाय कुम्हार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बचा हुआ जो नेह है, उसको रहा सहेज।
बुझने से पहले दिया, जलता कितना तेज।।
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क्या जायेगा साथ में, करलो जरा विचार।
आने-जाने के लिए, खुले हुए हैं द्वार।।
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जब हो जाता नीड़ का, जीर्ण-शीर्ण आकार।
हंस नहीं करता कभी, तब उसको स्वीकार।।
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माटी कैसी भी रहे, रचता जाय कुम्हार।
कर देता है चाक पर, नया पात्र तैयार।।
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जीते जी ही जगत में, होता हाहाकार।
मर जाने के बाद में, बचता लोकाचार।।
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सोच-समझकर कीजिए, लोगों से संवाद।
दुनिया में इंसान की, नेकी आती याद।।
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रुकता-थकता है नहीं, कभी काल का चक्र।
सीधी-सच्ची राह पर, चलना कभी न वक्र।।
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8 टिप्‍पणियां:


  1. सोच-समझकर कीजिए, लोगों से संवाद।
    दुनिया में इंसान की, नेकी आती याद।।
    बहुत सुंदर।

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा 16.09.2021 को चर्चा मंच पर होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
  3. दोहों में झलकता जीवन -दर्शन । प्रेरक दोहों की रचना और सराहनीय प्रस्तुति के लिए साधुवाद और हार्दिक अभिनन्दन ।

    जवाब देंहटाएं
  4. सोच-समझकर कीजिए, लोगों से संवाद।
    दुनिया में इंसान की, नेकी आती याद।।


    जीवन दर्शन दिखाते दोहे.. हार्दिक आभार....

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत ही सुंदर दोहे आदरणीय सर।
    सादर प्रणाम

    जवाब देंहटाएं
  6. शाश्वत भावों का हृदय स्पर्शी सृजन।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं

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