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सोमवार, 27 सितंबर 2021

दोहे "आसमान के दीप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बहती अविरल भाव से, निर्मल जल की धार।
सुन्दर सुमनों ने लिया, पानी में आकार।।
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मोती जैसी सुमन से, टपक रही है ओस।
मन को महकाती महक, कर देती मदहोस।।
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हीरे जैसी चमक है, निखरा-निखरा गात।
कितना सुन्दर लग रहा, झरता हुआ प्रपात।।
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नाविक बैठा सोचता, चप्पू लेकर साथ।
अनुपम रचना कर रहा, सारे जग का नाथ।।
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खारे जल का पान कर, मोती देती सीप।
आलोकित जग को करें, आसमान के दीप।।
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माया मालिक की नहीं, कोई पाया जान।
विज्ञानी सब जगत के, हो जाते हैरान।।
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दाता सबका एक है, लेकिन नाम अनेक।
चमत्कार को देखकर, है असमर्थ विवेक।।

6 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (28-9-21) को "आसमाँ चूम लेंगे हम"(चर्चा अंक 4201) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    ------------
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  2. दाता सबका एक है, लेकिन नाम अनेक।
    चमत्कार को देखकर, है असमर्थ विवेक।।

    बहुत अद्भुत पंक्तियाँ.. नमस्कार है आपको गुरुदेव

    जवाब देंहटाएं
  3. दाता सबका एक है, लेकिन नाम अनेक।
    चमत्कार को देखकर, है असमर्थ विवेक।।
    लाजवाब सृजन
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं

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