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सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

दोहे "आती इन्दिरा याद" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बिना युद्ध के वीर क्यों, होते रोज शहीद।
माँ-बहनों की दिनों-दिन, टूट रही उम्मीद।।

अच्छी लगती है बहुत, जोशीली तकरीर।
लेकिन भाषण पर अमल, कब होगा प्रणवीर।।

जो कुछ भाषण में कहा, पूर्ण करो वागीश।
बैरी के अब काटिए, बदले में सौ शीश।।

अब तक पाकिस्तान को, किया नहीं बरबाद।
लोगों को आने लगी, इन्दिरा जी फिर याद।।

सरहद पर निर्दोष का, अगर बह गया खून।
नहीं थमेगा फिर कभी, सिर पर चढ़ा जुनून।।

लोकतन्त्र में लोक का, होता बहुत महत्व।
रखो बनाकर परस्पर, इनमें ठोस घनत्व।।

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