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मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

दोहे "बहता शीतल नीर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सरदी अब घटने लगी, चहका है मधुमास।
खेतों से नव-अन्न की, आने लगी सुवास।।
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बया नीड़ से झाँकती, अपने चारों ओर।
 हरित धरा पर हो गयी, अब तो सुन्दर भोर।।
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धूम मचाने आ गया, फिर से अब ऋतुराज।
बदल गया मधुमास में, सबका आज मिजाज।।
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जोड़ों पर चढ़ने लगा, फिर से इश्क बुखार।
वादों की चलने लगी, अब तो मस्त बयार।।
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लगा पिघलने हिमालय, बहता शीतल नीर।
काँवड़ लेने जायेंगे, अब बहनों के वीर।।
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मौसम आवारा हुआ, उमड़ रहा है प्यार।
नेह-नीर का पान कर, फूल बने उपहार।।
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बिखरे चारों ओर हैं, प्रेम-दिवस के रंग।
दकियानूसी लोग तो, करें रंग में भंग।।

6 टिप्‍पणियां:

  1. वाह शास्त्रीजी बसन्त के आगमन का आभास कराते सुंदर दोहे।

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  2. बहुत ही सुन्दर सृजन आदरणीय
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  3. वसन्त जैसा ही शीतल सुरभित मनोरम वर्णन -मन में सारे आभास जगा देता है.

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत खूब ,,,मनमोहक ,सादर नमस्कार सर ,आप को होली की हार्दिक बधाई

    जवाब देंहटाएं

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