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नमन आपको शारदे, मन के हरो विकार।
नूतन छन्दों का मुझे, दो अभिनव उपहार।।
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तुक-लय-गति का है नहीं, मुझको कुछ भी ज्ञान।
मेधावी मुझको करो, मैं मूरख नादान।।
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सबसे पहले आपका, करता हूँ मैं ध्यान।
शब्दों को पहनाइए, कुछ निर्मल परिधान।।
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गीत-ग़ज़ल-दोहे लिखूँ, लिखूँ बाल साहित्य।
माता मेरे सृजन में, भर देना लालित्य।।
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लिखने वाली आप हो, मैं हूँ मात्र निमित्त।
पावन करना चित्त बस, नहीं चाहिए वित्त।।
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बैठक में अज्ञान की, पसरी हुई जमात।
विद्वानों को हाँकते, अब धनवान बलात।।
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देवी हो माँ ज्ञान की, ऐसे करो उपाय।
साधक वीणापाणि के, कभी न हों असहाय।।
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जगत गुरू बन जाय फिर, अपना प्यारा देश।।
वीणा की झंकार से, पावन हो परिवेश।।
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जी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (18-11-2019) को "सर कढ़ाई में इन्हीं का, उँगलियों में, इनके घी" (चर्चा अंक- 3523) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित हैं….
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रवीन्द्र सिंह यादव
बहुत सुंदर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंसुंदर पावन भाव लिए सरस दोहे ।
जवाब देंहटाएंजगत गुरु, फिर से बने भारत, यही अरमान है,
जवाब देंहटाएंअक्ल पर भारी पड़ी, लाठी, हमारी शान है.
सुंदर
जवाब देंहटाएंसुंदर प्रस्तुति
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