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मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

"क्यों ये सज़ा दे रहे??" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


धूप थी कल कड़ी, और थी गर्मी बड़ी,
ठण्डी कुल्फी का सब थे मज़ा ले रहे।
आज छाये हैं घन, है अन्धेरा सघन,
किस जनम की ये बादल सज़ा दे रहे।।

कैसी बे-वक्त में है ये बारिश पड़ी,
बिन बुलाए ही सर्दी बहुत है बढ़ी,
खेत जल से भरे, धान सब गिर पड़े,
किस जनम की प्रभू, ये सज़ा दे रहे।।
प्यास थी जब लगी, तब नदारद था जल,
आस थी जब जगी, तब हृदय था विकल,
तब तो थे बस डरे, किन्तु अब हैं मरे,
मेरी माटी को, क्यों ये सज़ा दे रहे।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने ! फूलों की तस्वीर ने तो मन मोह लिया!

    जवाब देंहटाएं
  2. प्यास थी जब लगी, तब नदारद था जल,
    आस थी जब लगी, तब हृदय था विकल,
    तब तो थे बस डरे, किन्तु अब हैं मरे,
    मेरी मिट्टी को, क्यों ये सज़ा दे रहे।।

    bahut badhiya sir abhaar .

    जवाब देंहटाएं
  3. धूप थी कल कड़ी, और थी गर्मी बड़ी,

    ठण्डी कुल्फी का सब थे मज़ा ले रहे।

    आज छाये हैं घन, है अन्धेरा सघन,

    किस जनम की ये बादल सज़ा दे रहे।।


    बहुत सुन्दर, कुदरत भी कब तक बक्सेगी शाश्त्रीजी !

    जवाब देंहटाएं
  4. धूप थी कल कड़ी, और थी गर्मी बड़ी,
    ठण्डी कुल्फी का सब थे मज़ा ले रहे।
    आज छाये हैं घन, है अन्धेरा सघन,
    किस जनम की ये बादल सज़ा दे रहे।।

    अत्यंत सुन्दर रचना शास्त्री जी और खुशी इस बात की है कि रोज पढ़ने को मिल रहे है

    जवाब देंहटाएं
  5. पंकज मिश्र जी!
    मेरी तो पूरी दिनचर्या ही नियमित है।

    जवाब देंहटाएं
  6. अनियमित मौसम पर अच्छी शिकायती कविता लिख दी है आपने ...!!

    जवाब देंहटाएं
  7. bahut hi satik likha hai........badi khoobi se shikayat ki hai.......bahut sundar likha hai

    जवाब देंहटाएं
  8. मतलब वहां भी बारिश का धमाल जारी है.

    जवाब देंहटाएं
  9. अभी तीन दिन पहले उत्तर प्रदेश के मुजफ्‍फर नगर में शुक्रताल गयी थी। रात 9 बजे वहाँ पहुँचे और रात भर गर्मी की मार से त्रस्‍त रहे। लेकिन दूसरे दिन कुछ ठण्‍डा मौसम था, मालूम पडा कि कई जगह बारिश हो रही है और जब कल दिल्‍ली से उदयपुर के लिए ट्रेन पकडी तो रास्‍ते में ठण्‍ड लगने लगी। मौसम भी कैसे-कैसे बदलाव करता है? आपकी कविता पढकर तीन दिनों की यात्रा का स्‍मरण हो आया।

    जवाब देंहटाएं
  10. प्यास थी जब लगी, तब नदारद था जल,
    आस थी जब जगी, तब हृदय था विकल,
    तब तो थे बस डरे, किन्तु अब हैं मरे,
    मेरी माटी को, क्यों ये सज़ा दे रहे।

    bahut sahi kaha aapne.........

    yahan Lucknow mein to aaj subah se itni baarish...... hui......hai ki poochiye mat......... poora jan jeevan dhwast tha...... drainage system waise bhi yahan ka kisi kaam ka nahi hai........... sab taraf paani hi paani........

    जवाब देंहटाएं
  11. बहुत सुंदर रचना रची है आप ने, ओर चित्र भी बहुत सुंदर.धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  12. सुंदर चित्रों के साथ साथ सुंदर कविता...
    बढ़िया वर्णन किया आपने....बधाई!!

    जवाब देंहटाएं
  13. "कैसी बे-वक्त में है ये बारिश पड़ी,
    बिन बुलाए ही सर्दी बहुत है बढ़ी,
    खेत जल से भरे, धान सब गिर पड़े,
    किस जनम की प्रभू, ये सज़ा दे रहे।।
    प्यास थी जब लगी, तब नदारद था जल,
    आस थी जब जगी, तब हृदय था विकल,
    तब तो थे बस डरे, किन्तु अब हैं मरे,
    मेरी माटी को, क्यों ये सज़ा दे रहे।।"

    अनियमित मौसम पर बहुत ख़ूबसूरत रचना,बधाई!!

    जवाब देंहटाएं
  14. सटीक शायद भगवान इन्द्र को समझ मे आये कब पानी देना है कब नही।

    जवाब देंहटाएं
  15. shaastri ji
    namaskar

    kya kahun , aapki kavita padhkar nishabd hoon .. dil ko chooti hui rachna hai .. ...

    hum sab afteraal , bhagwaan ke marzi ke zere saaya jeete hai ..

    aapki kavita me yahi sabit hua hai ..

    meri badhi sweekar kare ...

    Regards

    Vijay
    www.poemsofvijay.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  16. दिल चीर करके आपने रखा है जिस तरह,
    दिल में बढ़ा है आपका सम्मान इस तरह,

    जवाब देंहटाएं

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