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शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

"चाँद और निशा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



विरह की अग्नि में दग्ध क्यों हो निशा, 
क्यों सँवारे हुए अपना श्रृंगार हो।
क्यों सजाए हैं नयनों में सुन्दर सपन, 
किसको देने चली आज उपहार हो।


क्यों अमावस में आशा लगाए हो तुम,
चन्द्रमा बन्द है आज तो जेल में।
तुम सितारों से अपना सजा लो चमन,
आ न पायेगा वो आज तो खेल में।


एक दिन तो महीने में धीरज धरो,
कल मैं कारा से उन्मुक्त हो जाऊँगा।
चाँदनी फिर से चमकाउँगा रात में,
प्यार में प्रीत में मस्त हो जाउँगा।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

20 टिप्‍पणियां:

  1. वाह शास्त्री जी क्या खूब लिखा है कहने के लिए शब्द ही नहीं है

    जवाब देंहटाएं
  2. क्यों अमावस में आशा लगाए हो तुम,
    चन्द्रमा बन्द है आज तो जेल में।
    तुम सितारों से अपना सजा लो चमन,
    आ न पायेगा वो आज तो खेल में।


    wah ! bahut khoob........

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने! चित्र बहुत पसंद आया!

    जवाब देंहटाएं
  4. एक दिन तो महीने में धीरज धरो
    धीरज ही तो वह मूलमंत्र है --- धीरज तो धरना ही होगा.

    जवाब देंहटाएं
  5. क्यों अमावस में आशा लगाए हो तुम,
    चन्द्रमा बन्द है आज तो जेल में।
    तुम सितारों से अपना सजा लो चमन,
    आ न पायेगा वो आज तो खेल में।

    बहुत ही सुन्दर,

    जवाब देंहटाएं
  6. शास्त्री जी नमस्कार ,
    आप ने लिखा है और हमने पढा है लेकिन आपका आभार है , हमारे ऊपर भार है कि आपने इतना सुन्दर लेख हमें पढाया वो भी मुफ्त में

    जवाब देंहटाएं
  7. माफी चाहूँगा, आज आपकी रचना पर कोई कमेन्ट नहीं, सिर्फ एक निवेदन करने आया हूँ. आशा है, हालात को समझेंगे. ब्लागिंग को बचाने के लिए कृपया इस मुहिम में सहयोग दें.
    क्या ब्लागिंग को बचाने के लिए कानून का सहारा लेना होगा?

    जवाब देंहटाएं
  8. माफी चाहूँगा, आज आपकी रचना पर कोई कमेन्ट नहीं, सिर्फ एक निवेदन करने आया हूँ. आशा है, हालात को समझेंगे. ब्लागिंग को बचाने के लिए कृपया इस मुहिम में सहयोग दें.
    क्या ब्लागिंग को बचाने के लिए कानून का सहारा लेना होगा?

    जवाब देंहटाएं
  9. सुन्दर गीत है शास्त्री जी ......... बहुत दिल से लिखता हैं आप .........

    जवाब देंहटाएं
  10. एक दिन तो महीने में धीरज धरो,
    कल मैं कारा से उन्मुक्त हो जाऊँगा।
    चाँदनी फिर से चमकाउँगा रात में,
    प्यार में प्रीत में मस्त हो जाउँगा।

    wah sunder abhivyakti. badhaai.

    जवाब देंहटाएं
  11. अंधेरी रात जाएगी,चाँदनी रात फिर से आएगी
    आपकी यह सुंदर कविता हमेशा गायी जाएगी..

    बहुत बढ़िया लिखा आपने..बधाई

    जवाब देंहटाएं
  12. वाह शास्त्रीजी वाह !
    एक दिन तो महीने में धीरज धरो,
    कल मैं कारा से उन्मुक्त हो जाऊँगा।

    गज़ब कर दिया.............

    जवाब देंहटाएं
  13. वाह शास्त्री जी क्या खूब लिखा है

    जवाब देंहटाएं
  14. shastri ji
    HUNGAMA NE FIR HUNGAMA MACHA DIYA HAI SHARMA JI AUR BABLI JI KE BLOG PAR.JAIYE AUR MAZA LIJIYE.DONOLADE MARE JA RAHE HAIN.

    जवाब देंहटाएं
  15. बेनामी जी!
    मुझ पर कृपादृष्टि रखना!
    जो जैसा करेगा, वो वैसा ही भरेगा।
    आपका निवेदन अस्वीकार नही करूगा।
    आज कोई चटपटी रचना लिख ही दूँगा।

    जवाब देंहटाएं
  16. क्या खूब लिखा है..... ख़ूबसूरत रचना........वाह !..

    जवाब देंहटाएं
  17. वाह मय़ंक जी रचना तो बहुत सुन्दर प्रेम रंग मे रंगी हुई मगर कम्मेन्ट पर कम्मेन्ट और भी बडिया बधाई हो सुन्दर रचना के लिये

    जवाब देंहटाएं

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