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गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

‘‘हमारा सूरज’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)



पूरब से जो उगता है और पश्चिम में छिप जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

रुकता नही कभी भी चलता रहता सदा नियम से,
दुनिया को नियमित होने का पाठ पढ़ा जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

नही किसी से भेद-भाव और वैर कभी रखता है,
सदा हितैषी रहने की शिक्षा हमको दे जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

सूर्य उदय होने पर जीवों में जीवन आता है,
भानु रात और दिन का हमको भेद बताता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

दूर क्षितिज में रहकर तुम सबको जीवन देते हो,
भुवन-भास्कर तुमको सब जग शीश नवाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

14 टिप्‍पणियां:

  1. सूर्यदेव अपनी प्रशंसा से मुग्ध हो कर हर शब्द को रोशन कर रहे हैं बहुत सुन्दर कविता है बधाई

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  2. सूर्यदेव अपनी प्रशंसा से मुग्ध हो कर हर शब्द को रोशन कर रहे हैं बहुत सुन्दर कविता है बधाई

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  3. सूर्यदेव अपनी प्रशंसा से मुग्ध हो कर हर शब्द को रोशन कर रहे हैं बहुत सुन्दर कविता है बधाई

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  4. निर्मला जी इतनी प्रसन्न हो गई कि तीन बार टिप्पणी छोड़ गई, सत्य तो ये है कि आपने पोस्ट ही शानदार लिखी है।

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  5. अत्यन्त सुंदर रचना! सूर्योदय के होते ही नए दिन की शुरुयात होती है और हम सब यही चाहते हैं की दिन अच्छा बीते!

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  6. सूर्य को बेहद पारखी आँखों से परखने के बाद ही ऐसी सशक्त रचना होती है. आपने सूर्य क़र्ज़ चुका दिया. बधाई.

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  7. सूर्य देव की महानता को दर्शाती बहुत सुंदर कविता..
    धन्यवाद शास्त्री जी..

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  8. sooryadev par likhi ye rachna jeevan ko bhi sooraj ki roshni ki tarah roshan karti hai.........shukriya

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  9. यह सूर्य ऐसे ही उदित होता रहे यह कामना ।

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